शनिवार, अक्टूबर 22, 2011

वो किनारा


 वो  किनारा 

वो  किनारा  आज  भी  वोंही  पड़ा  होगा
अकेला   तनहा  जैसे  हमने  उसे  छोड़ा  था  वोंहा ,
कई  दफा  सोचता  हूँ  , पलट  के  जाऊं ?
शायद  कुछ  यादें  आज  भी  ज़िंदा  हो 
पर डरता  हूँ ,
 उन  बूढी  हो  चुकी  यादों  की  झुर्रिओं  से ,
उन  वक़्त  के  सिलवटो  से ,
 जिसने  कस  के  थामी  थी कभी  मेरी  बांह
डरता  हूँ  मैं  उन  लम्हों  से ,
 जब  तुम्हारी  सूनी  आँखों  के  कोरों   से  दो  हल्की  बारिश  की  बूंदी  टपकी  थी ,
मानो टीन के छप्पर से गिरती हो बंजर जमीं पे
और खो जाती हो
शायद   तुम  भूल  गयी  होगी ,
 पर  ये  बाते  जरूर  होंगी  याद  उस  धीमी  हवा  को ,
और  यकीनन  उस  दरिया  की  थमी  हुई  मौज  को ,
आज  भी  उसी  सुने  किनारे  के  पास  पड़ी , पत्तों  में  लिपटी   होगी  तुम्हारी  यादें
मै  डरता  हूँ  आज  भी  ,
कंही  तुम्हारी  परछाई  न   पहचान  ले  मुझे ,
मै  डरता  हूँ  ………….