वो किनारा
वो किनारा आज भी वोंही पड़ा होगा
अकेला तनहा जैसे हमने उसे छोड़ा था वोंहा ,
कई दफा सोचता हूँ , पलट के जाऊं ?
शायद कुछ यादें आज भी ज़िंदा हो
पर डरता हूँ ,
उन बूढी हो चुकी यादों की झुर्रिओं से ,
उन वक़्त के सिलवटो से ,
जिसने कस के थामी थी कभी मेरी बांह
डरता हूँ मैं उन लम्हों से ,
जब तुम्हारी सूनी आँखों के कोरों से दो हल्की बारिश की बूंदी टपकी थी ,
मानो टीन के छप्पर से गिरती हो बंजर जमीं पे
और खो जाती हो
शायद तुम भूल गयी होगी ,
अकेला तनहा जैसे हमने उसे छोड़ा था वोंहा ,
कई दफा सोचता हूँ , पलट के जाऊं ?
शायद कुछ यादें आज भी ज़िंदा हो
पर डरता हूँ ,
उन बूढी हो चुकी यादों की झुर्रिओं से ,
उन वक़्त के सिलवटो से ,
जिसने कस के थामी थी कभी मेरी बांह
डरता हूँ मैं उन लम्हों से ,
जब तुम्हारी सूनी आँखों के कोरों से दो हल्की बारिश की बूंदी टपकी थी ,
मानो टीन के छप्पर से गिरती हो बंजर जमीं पे
और खो जाती हो
शायद तुम भूल गयी होगी ,
पर ये बाते जरूर होंगी याद उस धीमी हवा को ,
और यकीनन उस दरिया की थमी हुई मौज को ,
आज भी उसी सुने किनारे के पास पड़ी , पत्तों में लिपटी होगी तुम्हारी यादें
मै डरता हूँ आज भी ,
कंही तुम्हारी परछाई न पहचान ले मुझे ,
मै डरता हूँ ………….
और यकीनन उस दरिया की थमी हुई मौज को ,
आज भी उसी सुने किनारे के पास पड़ी , पत्तों में लिपटी होगी तुम्हारी यादें
मै डरता हूँ आज भी ,
कंही तुम्हारी परछाई न पहचान ले मुझे ,
मै डरता हूँ ………….
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