गुरुवार, सितंबर 29, 2011

वक़्त और मै


एक  बार  गुजरते   हुए  वक़्त  को  आवाज  लगाईं 
वक़्त  ने  पलट  के  देखा  , उसके  चेहरे  पे  हलकी  हंसी  सी  आई 
रुककर , थमकर   या  फिर  लौटकर  मै  नहीं  आ  पाउँगा 
ए  दोस्त  पास  आकर  पूछ  जो  भी  पूछना  है 
तेरे  सवालो  का  जबाब  मै  तभी  दे  पाउँगा 
मैंने  अपनी  चाल  तेज़  की  और  जरा  पास  आकर  पूछा ? 
क्यों  भागते  हो  ?
क्यों  नहीं  देते  साथ  किसी  का ?
क्यों  हर  एक  इंसान  है  परेशान 
 ए  मतलबी   क्यों   नहीं  है  तुम्हे   ख्याल  किसी  का ?
वक़्त  की  हंसी  ठहाको में  बदल  गयी 
मनो  अट्टहास  कर  रहा  हो  कोई  विश्व  विजयी 
आँखों  में  आंखे  डाल  वो  फुसफुसाया
क्या  कहीं   पीछे  छूट  गया  है  तेरे  ख्वाबो  का  साया  ?
मैं   ठिठका  , पर  वक़्त  की  अपनी  थी  चाल 
उसने  मेरे  हाथो  को  थामा 
चलो  मेरे  दोस्त  अपने  पंखो  को  फैलाओ 
वक़्त  को  यूँही   दोषी  मत  बनाओ 
मै  तो  हमेशा  तुम्हारे  साथ  था 
मुझको  हिस्सों  में  बाटने  की  कवायेद  में  तुमको  कहाँ  ये  एहसास  था 
आँखों  बंद  होती  है  तो  होने  दो 
हवा  अगर  सिलती  है  तो  सिलने  दो 
याद  रख  तुने  वक़्त  का  हाथ  थामा  है 
बस  इतना  कर  , मंजिल  मत  बना  जंहा  तुझे  जाना  है 
एक  के  बाद  एक  कई   फलसफे  आयेंगे 
रिश्ते  खिलेंगे  और  फिर  मुरझाएंगे 
याद  रख  जब  वक़्त  छुटता  है  तो  सभी  आगे  बढ़  जाते  है 
हाल  पूछने  अपने  भी  लौट  कर  नहीं  आते  है 
जब  भी  तेरी  चाल  पे  कोई  एक  ऊँगली  उठाएगा 
वो  खुद  की  और  मुड़ी   अपनी  ही   तीन  उँगलिओ   को  पायेगा 
गिरता  है  तो  गिर 
मगर   चल , दौड़  , और  उड़   फिर 
मै  कन्हा  जाऊँगा 
जब  तू  चाहेगा  तेरे  पास  चला  आऊंगा 
तेरी  चाहत  में  जो  शिद्दत  है 
वक्त  को  भी  उसी की  जरूरत  है 
अपने  ख़्वाबों  को  सजाना  मत  छोड़   
देख  कितना  सुनहरा  है  जिंदगी  का  हर  मोड़ 
तुने  मुझको  आवाज   दी  यही  बस  काफी  है 
याद  रख  सिर्फ  वक़्त  ही  तेरा  साथी  है 
इतना  कहकर  वो  मुस्कुराया 
चला  गया  कंही  जहां   से  था  वो  आया 
मैंने  अपने  पंख  फैलाये 
चल  दिया  अगली  मंजिल  पे  बिना  एक  पल  गवाए 
शयेद  एक  दिन  मै भी  गिरूंगा 
पर  फिर  से  मै  खुद  से  लडूंगा 
ए  वक़्त  अब  मै  खुद  के  लिए  उठूँगा 
हर  एक  दिन   आसमान  चूमूँगा  
मरे  बांहों  में  है  अब  संसार  समाया  
जो  मैंने  बरसो  से  नहीं  देखा , पल   में  तुमने  मुझो  वो  दिखाया 
चलो  चलता  हूँ  फिर  मिलता  हूँ 
कंही  से  ये  आवाज  आई 
वक़्त  साथ  ही  कंही  था 
ये  सोचकर   मेरे   होठों   पे  फिर   हंसी  लौट  आई 

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