रविवार, जुलाई 31, 2011

तन्हा

मुझे लगता था मै तन्हा  हूँ
या फिर मै चाहता था की मै तन्हा रहूँ
हर दो कदम पे  तुम थे  वंही  
पर तुमको देखा ही  कहाँ सही 
मेरी रफ़्तार ने कहीं  पीछे छोड़ दिया मुझको 
आज हर लम्हे में ढूंढता हूँ मै खुद को
आज दौलत की तन्हाई है
नशा है
रवानगी  है
पर जिसके  लिए चला था कंहा वो दीवानगी है ?
कहने को तो तुम  आज भी मेरे साथ हो
पर यूँ लगता है मानो हम तुम एक जिन्दा लाश हों
दिल चीखता है  
दरवाजे बंद है पर ये दिखता है
आँखे नम है
सांसे भी सिसकती है
इस पार खड़ा हूँ मै
उस पार शाम आज भी रोती है
चलो फिर  आँखों को बंद कर ले
फिर वापस लौट जाए जिसे खोया था
लाशो की ढेर से वापस चल कर भी 
क्या वो मिलेगा जिसके लिए ख्वाबो को संजोया था ?

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