ये मेरे ब्लाग की शुरुआत है. मैंने कभी सोचा नहीं था की मै ब्लॉग लिखूंगा वो भी हिंदी, पर अंग्रेजी ज्यादा अच्छी न होने के कारण हिंदी में ही लिखना सही समझा. ऐसे हिंदी में भी मेरी पकड़ काफी अच्छी तो नहीं है पर काम चल जायेगा. ये कहानी काफी लोगो को शायद सही लगे या फिर न भी लगे पर मै सिर्फ इस कहानी को सुनना चाहता हूँ. आप में से काफी लोग ये सोचेंगे की मैंने इसि कहानी को अपनी पहली कहानी क्यों चुना ? मैंने भी येही सोचा पर ये एक ऐसी दास्ताँ है जिसने प्रेम, दर्द और जिंदगी के प्रति मेरा नजरिया बदल दिया. चलिए वक़्त को बर्बाद न करते हुए मै अपनी कहानी शुरू करता हूँ.
सुनयना
ये बात सन १९९५ की
है जब मै अपने कॉलेज के दुसरे साल में पंहुचा. पहले साल के कॉलेज के बाद कैम्पस का रोमांच बिलकुल खत्म हो गया
था. खाली समय या तो मै अपने दोस्तों के साथ दरभंगा हाउस के काली मंदिर घाट पर
बिताता या फिर चाय के दूकान पे सिगरते पीते हुए . इन्ही दिनों मेरा लगाव ज्योतिष ,
हस्तरेखा और इस तरह की चीजों से हुआ. शुरू शुरू में मैंने कई किताबे
खरीद कर पढ़ डाली और फिर स्व्यम्घोसित ज्योतिष बनकर दोस्तों में रोब ज़माने लगा. एक
दिन काली घाट पे मै दोस्तों के साथ बैठा सिगरते के धुए उढ़ा रहा था तभी मेरी नजर
एक सज्जन पर पड़ी. साधर कद काठी, गोरा रंग, चस्मा, आँखों में गंभीरता और ललाट पर एक कला टीका
लगाये वो सज्जन गंगा किनारे खड़े सिगरेट पी रहे थे. तभी रवि उछल सा गया
बोला "अरे ये तो उपाध्याय सर है !". मैंने धीरे से सिगरेट
को किनारे फेका और उसका हाथ पकड़ के पुछा " ये कोंन है?". रवि बोला " चल बेटा तुझको मिलाता हूँ , बड़ा
ज्योतिष बनता फिरता है..देख असली ज्योतिष कैसा होता है" अब चौकने की बारी
मेरी थी. " साले पहले क्यों नहीं बताया ?" मैंने
बोला . रवि उठा और साथ में मै भी उठ खड़ा हुआ. एक सरसरी निगाह दौड़ाई देखा सूरज अब
डूबने को है, आकाश की लालिमा ऐसी मनो खुद इश्वर ने आकाश रूपी
कनवास पे रंग बिखेर दिए हों. नदी की
धीरी बहती धारा और उसके थोड़े ऊपर उड़ते पंछी एक लए में क्रंदन कर रहे थे ." अबे चल न" रवि ने
झकझोरा ..मैंने भी जल्दी से सीढियां उतरनी शुरू की. आठ दस सीढियां उतारकर हम उन सज्जन
की तरफ लपक चले. मेरे मन में अजीब सी घबराहट चल रही थी पर पावों मानो उस तरफ खीच
से रहे थे. उस गंभीर से सख्स जिनका नाम शायेद कोई
उप्धाये जी था ने हमें अपनी तरफ आते देखा. सिगरते के धुंए में मैंने फिर से उस
चहेरे को देखा थोडा अजीब लगा
पर जब तक मै खुद समझ पाता हम वोन्हा पहोंच गए थे. रवि ने झुक कर प्रणाम किया अब मै
क्या करता न चाहते हुए भी मुझे करना पड़ा. उन्होंने पूछा "अरे रवि कैसे हो सब
ठीक तो है न ? " . जी बिलकुल ठीक सर
आप कैसे है?" रवि छुटते ही बोला. इसपर वो
सख्स सिर्फ मुस्कुराया, मै उनकी तरफ देख रहा था शायेद उन्हें
भी थोरा असहज प्रतीत होता होगा पर मै सोच रहा था ये आखिर ये है क्या बला ?
तभी रवि ने उनसे कहा "सर ये मेरा
दोस्त निखिल है आपसे मिलना चाहता था कभी लेकर आऊं क्या , पटना
में कब तक है ?" मैंने रवि को देखा पर उसे मुझे देखने
की फ़ुर्सत कंहा थी..माजरा मेरे समझ से परे था फिर भी मै मुस्कुराया. " अभी तो
एक सप्ताह हूँ कल आ जाओ तुम दोनों, शाम की
पूजा के बाद मिलूँगा" सज्जन बड़े धीरे और गंभीर आवाज में बोले. रवि ने सर
हिलाया और फिर प्रणाम किया इस बार भी मैंने अनमने ढंग से प्रणाम किया औए हम दोनों
मुर गए. एक बार फिर मरा ध्यान छितिज की ओर चला गया सूरज का आखरी हिस्सा डूबने वाला
था लालिमा काफी काली और गहरी हो गयी थी. पंछी अपने अपने घोंसले में लौट रहे थे,
नदी अब शांत हो गयी थी और चारो तरफ अजीब
सा सन्नाटा फ़ैल रहा था. सीधी चढ़ते मैंने पलट कर देखा
वो सख्स वोंही खरा था..शायेद उसने दूसरी सिगरेट सुलगा ली. बढ़ते हुए अँधेरे के साथ
साथ उठता वो धुँआ एक अजीब से वातावरण की संरचना कर रहा था. मैंने रवि से
पूछा" साले ये चक्कर क्या है?" रवि ने लघबघ मुझे
खीचते हुए बोला "अभी जल्दी येन्हा से चल कल बताउंगा " हम अपनी अपनी मोटरसिकिल उठाकर घर चल दी.
क्रमशः 1
दुसरे दिन सवेरे उठाते ही मैंने रवि को फ़ोन
लगाया. उन दिनों मोबाइल नहीं हुआ करते थे और लगभग हर नए जवान हुए लड़के लड़किओं के घरो के फ़ोन पर उनके पुज्यनिए माता पिता का कब्ज़ा होता था. आज भी वही हुआ रवि की पुज्यनिए माता जी ने फ़ोन उठाया
" हेल्लो" उधर से अव्वाज आई , मैंने
सोचा कंहा फ़स गए फिर भी बड़े आदर से मैंने पुछा "
आंटी रवि उठ गया क्या आज क्लास जल्दी है..वो आ तो रहा
है न ?" उधर से जबाब आया " बेटा आज तो
सन्डे है किस प्रोफेस्सर का क्लास है , मोना या रेजेंट ( ये दोनों फिल्म हाल के
नाम है ) ". मेरा तो मानो काटो तो खून नहीं
फिर भी मैंने अपनी सहज्वृति का पुन उपयोग करते हुए एक
सधे हुए पेशेवर झूठे की तरह कहा " जी आंटी आज सन्डे ही है पर प्रोफेस्सर शर्मा ने आज घर पे बुलाया है..कोई नहीं रवि को सोने दीजिए मै चला जाता हूँ" मेरा काम हो गया उधर से एक तेज आवाज आई
" रवि कमबख्त तेरे दोस्तों का फ़ोन है..सब पास कर
जाएंगे और तो मरा येन्ही रह जायेगा ..जल्दी कर सब क्लास
जा रहे है..." फिर एक प्यार भरी आवाज आई " बेटा तुम कोंन बोल रहे हो " मैंने छुटते ही कहा " आंटी मै
निखिल" , आवाज फिर से कर्कश हो गयी " अरे रवि बेहूदा उठता है या नहीं..देख निखिल का फ़ोन
है". थोरी देर शांति रही फिर एक आलस और आश्चर्य से
भरी आवाज आई " साले अभी तो ९:३० ही हुए है , इतनी सुबह?" अब फ़ोन पर रवि था. मैंने धीरे से बोला अरे चल न कोई फिल्म चलते है
जल्दी तैआर हो जा मै १० मिनट में आ रहा हूँ", "ओ.के चल " कहकर रवि ने फ़ोन
काट दिया. मैंने फ़ोन रखकर समय देखा , गाडी की चाभी उठाई और चुपके से घर से निकल गया. घर से निकलते वक़्त भी दिमाग
में कुछ चल रहा था थोरी दूर जाने के बाद कल की घटना याद आई, सामने
ही सिगरेट की दूकान पे गाडी लगा कर सोचने लगा की साले रवि ने मेरा नाम क्यों लिया.
ये परेशानी सिर्फ रवि ही हल कर सकता है ये सोचकर मैंने सिगरेट की पाकेट खरीदी और
उसमे से एक सिगरेट निकाल कर जलाने लगा. कुछ मिनटों में ही रवि भी आ पहुंचा बोला
" साले , सन्डे को भी तो सोने दिया कर. चल कोन सी फिल्म
देखनी है." मैंने उसको एक सिगरेट बढ़ाते हुए कहा " सुना है मोना में मिशन
इम्पोस्सिब्ल लगी है चल देखते है . मैंने गाडी स्टार्ट की और हम चल पड़े. फिल्म
देखने के बाद हम वापस काली घाट पे आये और सीढियों पर बैठ गए. मैंने रवि की तरफ
देखते हुए पुछा " बेटा कल वो सब क्या था अब तो बता ?" उसने मेरे पॉकेट से सिगरेट निकालते हुए कहा " अरे वो प्रोफ़ेसर
उपधयाये थे." "प्रोफ़ेसर ?" मैंने जोर देते
हुए कहा " पर तू तो बोल रहा था कोई ज्योतिष है". सिगरेट सुलगाते हुए
अपने दवे होटों से वो बोला " अरे हाँ हाँ वो ज्योतिष के साथ साथ तांत्रिक भी
है . यु नो ही इज अ जिनिअस. पिछले साल मेरे मामा की बेटी भाग गयी थी, तुझे याद है न?" इस बात पे मैंने सिर्फ अपना सर
हिलाया, दरअसल मेरे इंटरेस्ट सिर्फ कल की घटना पर था. रवि
फिर सिगरेट के काश लेते हुए बोला " अरे उसको कोई नहीं ढूंढ सका पर उन्होंने ३
दिनों में ढूंढ दिया वो भी सिर्फ अपने घर पे बैठे बैठे". मैं बुरी तरह झुंझला
उठा "साले ये क्या ड्रामा है किसी फिल्म की घिसी पिटी कहानी सुना रहा है क्या
, आदमी है या सैटलाईट ? ". मैंने
ये कहकर उसके हाथ से सिगरेट ले लिया . रवि मेरी तरफ देखकर बोला " बेटा मानो
या न मानो कुछ तो था, मैंने प्रोफेस्सर साहब के येन्हा कई
बार भूत प्रेत से परेशान लोगो को भी आते देखा है." मै एकदम रुक सा गया "
भूत प्रेत ?, अबे ये तो मजेदार है सच बता कभी कुछ देखा है
क्या?" वो हंसकर बोला "साले पागल है क्या ?
मेरी तो इन चीजों से फटती है, मैं तो साला भाग
गया था". मैंने सिगरेट को जमीन में बुझाते हुए
कहा "कमीने तो मेरा नाम क्यों ले रहा था कल?" इसपर
वो हंस कर बोला " साले चूतिए मैं तुझे ऐसे आदमी से मिलवाना चाहता था जो असल
में एन चीजों को जानता है, तू बड़ा हीरो बनता था कॉलेज में
लड़किओं के सामने अब देख असली में ये लोग कैसे होते है. क्या बोलता है आज चलेगा
उनके पास ? बस मस्ती के लिए कुछ अपना फ्यूचर भी पूछा जाए
!" मैं एक पल के लिए सोच में पड़ गया . इन चीजों के प्रति मेरी जिज्ञासा बचपन
से ही थी पर मन में एक अजीब सा द्वन्द था. काफी सुन रखा था इन जैसे लोगो के बारे
में .फिर भी मन ने कहा चलो कुछ नया देखा जाए. मैंने कहा "चल आज शाम में चलते
है" . इसके बाद हम दोनों का ध्यान एक सुन्दर सी महिला पे चला गया वो शायेद
अपने पति के साथ गंगा में पूजा के फूल प्रवाहित करने आई थीं. महिला के साथ जो परुष
था संभवतः उनका पति ही होगा काफी बदशक्ल और कला सा था. " साला " रवि
बोला " देखा येहि साली दुनिया है इतनी सही लड़की और ....क्या दिखा होगा यार इस
घोंचू में इसको" मेरे ध्यान महिला की खूब्सुरुती में पूरा डूबा हुआ था. मैंने
एक और सिगरेट निकाली और सुलगता हुआ बोला " बेटा खुदा मेहरबान तो गधा पहेलवान".
महिला ने अपने पति को थाली पकराई और फूलों को धीरे धीरे गंगा में प्रवाहित करने
लगी. उसके खूबसूरत गोरे हांथी में उधौल के लाल लाल फूल काफी सुन्दर लग रहे थे.
मेरा ध्यान हाथों से फूलों पर चला गया , फूल धीरे धीरे लहरों
के साथ बह कर आगे चले जा रहे थे उनके पूछे कुछ टूटी हुई पंखुरिया और पत्ते भी थे.
मैंने सोचा शायेद हम सभी भी इन्ही की तरह है जिंदगी की धरा में बहते तो रहते है पर
शायेद ही पता होता हो की मंजिल कंहा है. भविष्य कोई नहीं जान सकता ." क्या बे
अभी तक घूर रहा है कुछ तो शर्म कर" रवि की अव्वाज से मेरी तन्द्रा टूटी.
मैं सिर्फ मुस्कुराया और उठ खरा हुआ "चल शाम में चलते है तेरे प्रोफेसर साहब के येन्हा.". हम दोनों घर की
तरफ निकल पड़े . पर मुझे शायेद ये पता नहीं था की आज की शाम मेरी जिंदगी को एक अजीब
मोड़ पर लाकर खड़ा कर देगी.
क्रमशः 2
शाम ६:३० ........ नहीं शाम ८ :३० बजे
सिढिया उतारते वक़्त
मैंने अपनी घडी पर नजर डाली " ओफ्ह ८:३० बज
गए" मानी धीरे से खुद से कहा. रवि मुझसे थोडा आगे था पर पता नहीं मुझे ऐसा
क्यों लगा जैसे वो कुछ खीचा खीचा सा है. मैंने मन ही मन में सोचा की उसे आवाज दूं
पर अन्दर से इक्छा नहीं हुई . हम अपार्टमेन्ट के बहार आकार खड़े हो गए. उन दिनों
शहर के हालात कुछ अछे नहीं होते थे , अपराध अपने चरम पे था .
सडकों पे सिर्फ कुछ आवारा कुत्ते और कुछ बेसहारा इंसान ही नजर आये. मैंने पॉकेट से
१ सिगरेट निकली और सुलगाने लगा. " अब चलना है या और भी कुछ बाकी है "
रवि ने बड़ी तल्ख़ आवाज में पूछा. इतना कुछ होने के बाद मुझे उससे इसकी उम्मीद थी
सो मै बिना उससे नजरे मिलाये स्कूटर के पास आ गया. उस सुनसान कपकपाती रात में
स्कूटर भी जम सा गया था , रवि ने दो-चार किक लगाए और फिर
स्कूटर को माँ बहेन की गालिआं देने लगा . मै थोडा अलग होकर चुपचाप सिगरेट पीता रहा,
तभी पता नहीं कोई मेरा दिल जोर से धडकने लगा लगा जैसे हम दोनों के
अलावा भी हमारे आस पास कोई है. मेरे दिमाग में उथल पुथल चल ही रही थी की एक तेज़
आवाज हुई और स्कूटर स्टार्ट हो गया. "अब चलियेगा
मालिक " व्यंग्यात्मक लहजे में रवि ने कहा . मेरा ध्यान बिल्डिंग की खिड़की
की तरफ गया , लगा शयेद कोई हमे ही देखा रहा है . जरा
गौर से देखा तो खिड़की बंद थी " शायद मेरा वहम हो
" ये सोच कर मै स्कूटर पर पीछे बैठ गया. सुनसान वीरान सड़क पर अब कुछ आवारा
कुत्ते और उनके जैसे सिर्फ हमी थे. कंही कंही पे एक दो लोगो ने अलाव जला रखी थी.
तेज़ चलती ठंढी हवा और उसपे चीखता स्कूटर मानो कानों को सुन्न कर रहा था. गांधी
मैदान के पास दूर से एक मध्हीम रोशनी दिखाई दी . कोहरे की वजह से कुछ स्पष्ट नहीं
था . थोडा और नजदीक आने पर देखा एक पान की गुमटी खुली
है. मैंने रवि का कन्धा धीरे से थप थपाया " क्या
है" फिर वोही तीखा अंदाज. मैंने सिर्फ उस रोशनी की तरफ इशारा किया. रवि ने गुमटी के पास लाकर स्कूटर रोक दिया. मै तेज़ी से उतारकर गुमटी की तरफ लपका , दरअसल मै रवि से किसी तरह के बहस में उलझाना
नहीं चाहता था. गुमटी के पास जाने पे देखा एक बुढा सा व्यक्ति कम्बल ओढ़ कर चुपचाप
बैठा है. बगल में छोटी सी डिबरी जल रही थी . पुरे दूकान में नजर दौराई तो उस अजीब
बूढ़े के अलावा सिर्फ खैनी के कुछ बण्डल और सस्ते सिगरेट के कुछ पाकेट पड़े थे.
मैंने अनमने ढंग से पूछा " बड़ी वाली सिगरेट नहीं है क्या?" उसने अपने सर से हल्का कम्बल सरकाया और लगभग घूरती हुई आँखों से देखतेहुए
बोला" कोन सा चाहिए" . .मैंने फिर धीरे से पूछा " बाबा कोई भी
सिगरेट है ". उसने अपने कापते हाथो से सिगरेट की डिबिया मेरे तरफ बढा दी .
ऐसे तो मै ये सिगरेट नहीं पिता था पर मैंने ले ली. माचिस उसके पास थी नहीं सो कागज
के टुकरे को मै उसकी डिबरी से सुलगाने लगा. सिगरेट लेकर
मैंने उसे जैसे ही सुलगाया रवि मेरे सामने आ खड़ा हुआ .
मै इसी पल से बचना चाह रहा था . बड़ी तीखी सी आवाज में
उसने पूछा " तू पागल हो गया है क्या ?" मैंने
सिगरेट का एक काश लिया और दूसरी तरफ देखने लगा. सच तो ये था की जबाब मेरे पास भी
नहीं था. लगभग मुझे धक्का देते हर रवि चिल्लाया " साले पागल हो गया है ,
या फिर सुनाई देना भी बंद हो गया है. क्या जरूरत थी ये सब करने की.
" मैंने कुछ कहना चाहा पर इससे पहले ही फिर चिल्लाया " ये सब मेरी ही
गलती है साला मै हूँ ही चूतिया , अरे क्यों इनसब चीजों में
पड़ता है यार , अब क्या ये सब करेगा.....मुझे पहले पता होता
की तू ये सब करेगा तो मै ले ही नहीं जाता." मैंने बड़े धीरे से कहा " चल
घर चलते है कल बात करेंगे ." रवि मुझे बचपन से जानता था मै जो सोचता हूँ वोही
करता हूँ. अब वो निरास सा और बिलकुल शांत हो गया . मैंने हलकी नजर उस बूढ़े पर डाली
शयेद वो डर सा गया था. मैंने उसकी तरफ मुडके पूछा :
कितना हुआ?" . "३ रुपये " बड़ी माधाम सी आवाज
आई. मैंने ५ रूपये निकाल उसको दिए और स्कूटर की तरफ बढ़ गया. रवि भी मेरे पीछे ही था तभी वो बुढा चिल्लाया
" अरे बुआ जी पैसा छूट गया ..लीजिए " हमने मुड़कर देखा तो अपनी गुमटी से
उतारकर हमारी तरफ आ रहा था. अब मैंने गौर किया उसका एक पैर नहीं था शयेद इसीलिए वो
अभी तक अपने इसी दूकान पर हो, या शायद येन्ही रहता भी
हो...बेचारा मैंने सोचा . रवि उसकी तरफ तेज़ी से लपका " अरे बाबा कोई बात नहीं
आप बैठी हम ही आते है ". .बुढा फिर बड़े शांत स्वर में बोला "नहीं बाबू
आपका पैसा रह गया था न इसी किए " रवि मेरे तरफ देखकर बोला " नहीं साहब
आपको दे रहे होंगे बाबा छूटा नहीं होगा
". ये व्यंग मेरे लिए स्पस्ट था. खैर मै फिर से स्कूटर पे बैठ गया. रवि वापस
आया और बाकी बचे पैसे मेरे हाथों में थमा दीये . मेरे लिए ये बाते कुछ मायेने नहीं
रखती थी इसलिए मैंने भी शान्ति से पैसे वापस ले लिए . स्कूटर फिर अपने गंतव्य की
तरफ चल पड़ा. रवि के घर पहुँचने पर मैंने अपनी मोटरसाइकिल ली और अपने घर की निकल पड़ा. मेरा घर रवि के घर से
थोरी ही दूर पे था सो मै जल्दी ही पहुच गया. घडी पे
नजर डाली १०:०० बज रहे थे. दरवान मुझे देखते ही लगभग दौरता हुआ आया " बाबा
मालिक आपको खोज रहे थे. काफी गुस्से में थे...अभी अभी गए है ." मेरे लिए ये बाते आम थी सो मैंने आराम से पुछा " कान्हा गए ?"
उसने अपने सर को हिलाते हुए कहा " टूर पे मेमसाहब और वो हवाई
अड्डा गए है". मई बिना कुछ बोले हुए घर के अन्दर आ गया. अन्दर आने पे सीधे मै अपने रूम में गया देखा मेरे बेड पे एक कागज पड़ा था
. मैंने उसे उठाकर अलग रख दिया, जानता
था की माँ ने ही रखा होगा. खाना खाने की इच्छा नहीं थी इसलिए मै सीधे बिस्तर पे आ
गया . लेटे लेटे शाम की बातों को सोचने लगा . कुछ देर पहले हुई घटनाएं मेरे सामने
किसी फिल्म के जैसी चलने लगी .
शाम ६ :३० बजे हम बोरिंग रोड पे थे . रवि ने एक पुराने से
अपार्टमेन्ट के सामने अपने स्कूटर को रोका. " यही जगह है क्या ?"
मैंने मुस्कुराते हुए पुछा. "
" हाँ येही है " वो बोला. हम कुछ ही पल में सीढियों से
चड़कर एक फ्लैट के सामने थे . रवि ने घंटी बजाई . मुझे
ये जगह कुछ अजीब सी लगी . मन में तरह तरह के सवाल उठ रहे थे . तभी किसी ने अन्दर
से कहा " दरवाजा खुला है ..आ जाएँ ". रवि ने दरवाजा धीरे से खोला .
शाम ६ :३० बजे हम बोरिंग रोड पे थे . रवि ने एक पुराने से
अपार्टमेन्ट के सामने अपने स्कूटर को रोका. " यही जगह है क्या ?"
मैंने मुस्कुराते हुए पुछा. "
" हाँ येही है " वो बोला. हम कुछ ही पल में सीढियों से
चड़कर एक फ्लैट के सामने थे . रवि ने घंटी बजाई . मुझे
ये जगह कुछ अजीब सी लगी . मन में तरह तरह के सवाल उठ रहे थे . तभी किसी ने अन्दर से
कहा " दरवाजा खुला है ..आ जाएँ ". रवि ने दरवाजा धीरे से खोला .
क्रमशः 3
दरवाजा खुलते ही रवि अन्दर की तरफ बढ़ा, मै भी
पीछे हो लिया . अन्दर का नज़ारा अजीब था . हम जिस रूम में खड़े थे उसमे एक मद्धम सी रौशनी बस थी. शायद जीरो पावर का कोई बल्ब जल रहा था.
पूरा कमरा लगभग खाली ही पड़ा था सिवाए एक टेबल और २
कुर्सिओं के. कमरे एक दूसरी तरफ एक बालकोनी थी जिसका दरवाजा खुला था. सामने सड़क के
लैम्प पोस्ट की रोशनी हो रही थी. तभी किसी गंभीर आवाज ने
मेरा ध्यान अपनी तरफ खीचा . " आइये रवि बैठिए " . मैंने ध्यान दिया रवि
अबतक कुर्सी पे बैठ चूका था मै भी बगल की कुर्सी पे बैठ गया. " प्रणाम
सर" रवि ने कहना शुरू किया " ये निखिल है ,
हम दोनों बस अपने बारे में जाने आये है.... कुछ भी बस ऐसे ही ......" . अब तक मै उस रोशनी का आदि हो चुका था और कमरे की
सारी चीजे मुझे स्पष्ट दिखाई दे रही थी. मेरे सामने वही सख्श बैठा था जिससे हम
मिलने आये थे. गंभीर चेहरा, गोरा रंग, ललाट
पे काला टीका , आँखों में पवार
का चश्मा . एकदम सरल पर बहोत आकर्षक व्यक्तित्व था . मैंने उनके कपड़ो को देखा वो न
तो किसी पुजारी या फिर न तो किसी ज्योतिष के जैसा लगे. हलती नीली शर्ट, काली पैन्ट उसपर चमचमाता हुआ किसी अछे ब्रांड का जूता. " पूछिए क्या
पूछना है ?" फिर से सामने बैठे व्यक्ति ने पुछा ,
आवाज बिलकुल नपी तुली गंभीर . " सर जरा हम दोनों की कुण्डलिया
देख लेते तो ........." रवि ने ये कहकर अपने जेब से एक कागज निकाल कर सामने
रख दिया. अब वो मेरी तरफ देखने लगा . मुझे कुछ समझ में आता इससे पहले ही वी धीरे
से बुदबुदाया " तेरी कुंडली ?" . मै इन सब चीजों
को नहीं मानता था इसलिए कभी कुंडली की जरूरत नहीं पड़ी , पर
इस समय मैंने सिर्फ इतना कहा " अरे यार मै तो लाना ही भूल गया ". रवि ने
मुझे ऐसे देखा मानो एक्जाम्स के पेपर लिक हो गए हो और मुझे उसका पता नहीं चला . तभी सामने से आवाज आई " कोई बात नहीं , लाइए आपका ही देख देता हूँ" अब रवि जल्दी से उनकी तरफ मुखातिब हो
गया. मैंने सामने देखा तो वो शख्स मुझे ही गौर से देख रहा था. मेरे देखने के बाद
भी वो कुछ देर मुझे देखता ही रहा जैसे मेरे मनोभावों को पढने की कोशिश कर रहा हो.
" ऐसा है की मै बस उत्सुक्तावास ही चला आया , दरअसल
मुझे इन सब बातों पे विश्वास ही नहीं है " मैंने उनको देखते हुए कहा. "
ह्म्म्म " उन्होंने आगे थोरा झुकते हुए रवि की कुंडली उठाई और बोले "
कोई बात नहीं ये ज़रूरी नहीं की हम सभी चीजों पे आँख बंद कर विश्वास ही कर ले
" . मैंने इस जबाब की अपेक्छा नहीं की थी , मुझे लगा ये
शख्स काफी दिलचस्प है सो बात आगे बढ़ने के लिए मैंने अपन हाथ आगे बढाया और कहा " सर, मेरा नाम तो आप जानते
ही है फिर भी मै आपको अपना इंट्रो खुद देता हूँ, मै निखिल
प्रकाश , आपसे मिलकर वाकई अच्छा लगा ". रवि ने धीरे से
मुझे ठोकर मारी, पर मैंने उसकी तरफ ध्यान देना जरूरी नहीं
समझा. सामने से उस शख्स ने बड़ी विनम्रता से अपना हाथ आगे किया और बोला " मै
प्रोफ़ेसर विनय उपाध्याय , मुझे भी आपसे मिलकर काफी प्रसन्नता
हुई ". अब छुटते ही मैंने अपना अगला सवाल किया " आप किसी आम ज्योतिष या
फिर किसी तांत्रिक के जैसे तो लगते नहीं है....माफ़ कीजियेगा पर आप है क्या ?"
उन्होंने लगभग मुस्कुराते हुए जबाब दिया " मै वोही हूँ ".
फिर माहोल में थोरी चुप्पी छा गई . मैंने इस जबाब की
अपेक्छा नहीं की थी या फिर ऐसा समझिए मै जो सोच कर ये पूछा था उस रूप में उस सख्स ने अपनी प्रतिक्रया नहीं दी. ख़ैर मैंने रवि की तरफ
देखा वो अब परेशान हो रहा था. मैंने फिर पूछा " क्या भूत प्रेत होते है ?"
तभी दरवाजे पे किसी ने दस्तक दी . हम सभी का ध्यान दरवाजे की तरफ़ा
चला गया . प्रोफ़ेसर साहब ने फिर उन्ही वाक्यों को दोहराया " दरवाजा खुला है
अन्दर आ जाएँ" . दरवाजा हलके से खुला और अन्दर एक अधेड़ उम्र के आदमी ने
प्रवेश किया " जी मै उपाध्याय जी से मिलना चाहता हूँ" उसने बोला. "
बोलिए" इधर से जब मिला. वो थोडा और नजदीक आया और बोला " जी मुझे मल्लिक
साहब ने भेजा है मै दिनेश कुमार अग्रवाल गुजरात से " . "आइये
बैठिए" ये रवि ने कहा और जल्दी से अपनी सीट से उठ खडा हुआ. मै अभी भी वोंही बैठा था मेरे लिए ये बाते कोई मायेने नहीं रखती थी
सो मै चुपचाप उस नए शख्श को देखने लगा. उसकी उम्र लगभग ५५ की होगी बाल आधे से
ज्यादे सफ़ेद हो चुके थे . चेहरे पे परेशानी साफ़ झलक रही थी . हाथो में उसने एक
कागज का बण्डल दवा रखा था. लगभग लडखडाते हुए वो मेरे बगल वाली कुर्सी पे बैठ गया .
" पानी मिलेगा क्या ?" उसने पुछा . उसके चेहरे पे
पसीना मुझे साफ़ दिखा रहा था . जाड़े की रात और इतना पसीना मैंने मन ही मन सोचा.
अचानक लगा अरे ये साला कंहा
से आ गया मै तो अभी शुरू ही हुआ था पता नहीं कब तक बैठेगा . तभी उपाध्याय साहब ने
रवि की तरफ देखते हुए बोला " रवि जरा निचे से एक बोतल मिनरल वाटर ले आयेंगे
" ये कहकर उन्होंने अपने पर्स से कुछ पैसे निकाले ." अरे नहीं रहने
दीजिए सर मै ले आता हूँ अभी " ये कहकर रवि तेजी से कमरे के बहार निकल गया. अब
मै उस नए आये इंसान को देखने लगा मानी अब वो कुछ कहने के लिए थूक घोंट रहा था ." विनय जी मै
गुजरात में एक बिसिनेस करता हूँ , ऊपर वाले की दया से सब कुछ
है मेरे पास पर पिछले ६ महीने से एक गंभीर समस्या से
परेशान हूँ, कई जगह गया पर अब आप
ही कुछ कर सकते है". ये कहकर वो चुप हो गया. अब मेरा पूरा ध्यान इस मिस्टर
अग्रवाल की तरफ चला गया . " जी बताइए क्या समस्या है ?" उपाध्याय जी ने आहिस्ते से पुछा. अग्रव्वाल जी ने मेरी तरफ देखा और फिर
उपाध्याय जी के तरफ देखते हुए कहा " जी.....दरअसल......मै सोच रहा था
..." . मै तुरंत समझ गया की ये इंसान मेरे सामने शायेद बात नहीं करना चाह रहा
हो सो मै उठने को हुआ. तभी मिस्टर उपाध्याय ने कहा " कोई बात नहीं आप कहिए
ये मेरे ही साथ है". मैंने उनकी तरफ देखा पर वो अग्रवाल साहब की तरफ ही देख रहे थे. मुझे काफी आचार्य
हुआ.अग्रवाल साहब ने मुझे देखा और एक फीकी सी मुस्कान उनके चहरे पे आ गयी, जबाब में मुझे भी वैसी ही मुस्कान अपने चेहरे पे लानी पड़ी. अब वो शख्स
थोरा आश्वस्त लगा. उसने अपने कागज के बण्डल को सामने मेज पर रखा औए उसे खोलने लगा.
मेरा ध्यान उस बण्डल पर था " पता नहीं क्या निकालेगा ये बुड्ढा " मै मन
ही मन बुदबुदाया. जल्दी ही उसने उन बंडलो में से कई मेडिकल रिपोर्ट जैसे पेपर
निकाले और उन्हें एक तरफ रख दिया फिर एक बड़ा सा चौड़ा सा लिफाफा निकला और उसे
खोलने लगा. तभी रवि
पानी लेकर आ गया और बोतल मेज पर रख दी .
पानी की इस कमबख्त बोतल ने पुरे माहोल में इंटरवल ला
दिया, अग्रवाल साहब ने झट से बोतल खोला और ऊपर से पानी गटकने लगे. पुरे कमरे में चुप्पी छाई हुई थी थोरी देर
तक सिर्फ गले से पानी उतरने की आवाज आती रही. आधी बोतल ख़त्म करके अग्रवाल साहब ने
एक गहरी सांस ली और बोतल मेज पर रख दिया. फिर से लिफाफा उनके हाथो में था तभी
उन्होंने बोतल का ढक्कन उठा लिया , मैंने झट आगे बढ़कर ढक्कन
उनके हाथ से ले लिए और बोतल में लगते हुए कहा " आप चिंता न करे सर मै लगा
लूँगा बस आप अपनी समस्या बताये" . उसने थैंक्स कहकर फिर से लिफाफा उठा लिया.
मैंने उपाध्याय जी को देखा वो हलके से मुस्कुरा रहे थे. रवि ने मेरे कंधे को हलके
से दबाया जैसे मुझे आराम से बैठने को कह रहा हो.
अग्रव्वल साहब ने लिफाफा खिला और उसमे से एक तस्वीर निकाली . उपाध्याय जी के तरफ
बढ़ाते हुए उन्होंने कहा " सर ये है मेरी बेटी सुनयेना ...सुनयेना अग्रवाल "...
सुनयना : ?
मैंने तस्वीर को अपनी हाथों में झट से ले लिया..ये प्रतिक्रया काफी
चौकाने वाली थी . सभी मेरे तरफ देखने लगे . उपाध्याय जी ने हलकी सी मुस्कराहट के
साथ मेरी तरफ देखा. अग्रवाल साहब भी लगभग हैरान ही थे और सबसे ज्यादा परेशान रवि
था. मुझे जब तक अपनी गलती का एहसास होता उपाध्याय जी ने बोला " निखिल
पहले आप देख ले फिर मई देखूंगा " . मई लगभग झेप गया. पर तस्वीर को देखने का
लोभ मुझसे गया नहीं था , मैंने भी बेह्स्र्मो की तरह देखते
हुए कहा "जी सर" . तबतक रवि मेरे कंधो पर झुक कर तस्वीर को देखने लगा.
हमने अभी तस्वीर देखना शुरू ही किया था की उपाध्याय जी ने कहा " तो अग्रवाल
जी , आपकी बच्ची के स्वभाव में बदलाव कब से आना शुरू हुआ ?"
. अग्रवाल साहब ने उपाध्याय जी को ऐसे देखा मानो उन्हें साप सूंघ
गया हो. रवि भी उसी तरफ देखने लगा. मई अभी भी तस्वीर में ही फस था. मैंने अपनी
नजरे हलकी सी उठाई और मुस्कुराते हुए उपाध्याय जी को देखा. मुझे पता था ये एक ऐसा
सवाल है जी शयेद हमेशा ही निशाने पे लग सकता है " जब कोई परेशानी होती है तो
जिंदगी खुद बा खुद काफी बलावो करती है, ये तो काफी आम बात
है" मैंने मन ही मन में खुद से बोला. अग्रवाल साहब ने बड़ा संचिप्त सा जबाब
दिया " ६ महीनो से सर " . कमरे में फिर चुप्पी च गयी. उपाध्याय जी ने
सिगरेट निकलते हुआ अग्रवाल साहब से पुचा" आप लेंगे?". "नहीं" फिर से वोही संचिप्त उत्तर . मैंने तस्वीर पे अपनी नजरे घुमानी
शुरू की. एक दम से गोरा रंग, आंखे काफी बड़ी बड़ी मानो अब
बोल देंगी. बाल कंधो तक झूलते हुए जैसे अभी अभी हवा ने उनको बिखेरा हो. बदन एकदम
तराशा हुआ, उम्र लगभग १६-१७ रही होगी . लाल रंग के टी-शर्ट
और नीली जींस में काफी वो चुप चाप खड़ी थी. पर चेहरे पर कुछ कमी थी..क्या? मैंने खुद से पूछा ..आखिर ऐसा क्या है जो इसमें नहीं दिख रहा है? फिर मैंने उसके होठों को देखा एकदम बेजान और सूखे पड़े थे...हंसी मानी
वर्षो से इन होठों पर आई ही न हो. " लीजिए निखिल आप तो पिटे है न?"
मैंने नजरे उठाई तो देखा उपाध्याय जी ने मेरी तरफ एक सिगरेट बाधा
राखी थी . मैंने उनकी आँखों में देखा काफी शांत और गहरी आन्हें . चमों के अन्दर से
भी काफी प्रभावशाली . मैंने झट से हाथ आगे बढ़ा कर सिगरेट थाम ली. उन्होंने लाइटर
मेरी तरफ बढाया. मैंने सिगरेट जलाई और लाइटर के साथ तस्वीर भी उन्हें बढ़ा दी .
उन्होंने एक सरसरी निगाह दौरे और फिर उसे अपने ड्रावर में रख लिया. " क्या
आपने हाल में अपने घर में कोई बदलाव किए है ?" . मैंने
अग्रवाल साहब को देखा उन्होंने लगभग चौंकते हुए कहा " जी सर ..हमने अभी
अभी नया घर ही बदला है, मैंने अपना घर बनाया है इसलिए किराये
के मकान को चोर करके हम हम अपने मकान में आ गए है ". " क्या आये हुए ६-७
महीने हुए हो गए ?" उपाध्याय जी ने तुरंत पूछा.
."जी लगभग ७ महीना "